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Philosphical
शहर
अपनी झलक
2 min read 2026-07-07
शहर उसकी ऊँची इमारतों का नहीं, अधूरे ख़्वाबों का है।
शहर उसकी भागती सड़कों का नहीं, ठहरे हुए सवालों का है।
शहर उसकी भीड़ का नहीं, अकेले चेहरों का है।
शहर उसकी रोशनियों का नहीं, अँधेरे कमरों का है।
शहर उसकी आवाज़ों का नहीं, दबे हुए शोर का है।
शहर उसकी मंज़िलों का नहीं, रोज़ बदलते रास्तों का है।
शहर उसकी दुकानों का नहीं, खाली जेबों के हिसाब का है।
शहर उसकी बारिश का नहीं, भीगते हुए काग़ज़ों का है।
शहर उसकी सुबह का नहीं, रातभर जागती आँखों का है।
शहर उसकी नींद का नहीं, कल की चिंता का है।
शहर उसकी जीत का नहीं, हर रोज़ हारकर उठने का है।
शहर उसकी दौड़ का नहीं, पीछे छूट जाने के डर का है।
शहर उसकी पहचान का नहीं, पहचान बनाने की कोशिश का है।
शहर उसके घरों का नहीं, घर तलाशते मुसाफ़िरों का है।
शहर उसकी ख़ामोशी का नहीं, भीतर पलते तूफ़ानों का है।
शहर उसकी कहानी का नहीं, हर चेहरे की अधूरी कहानी का है।
शहर उसकी दूरी का नहीं, पास होकर भी अनजान रहने का है।
शहर उसकी रात का नहीं, रात के बाद फिर सुबह करने का है।
शहर उसकी थकान का नहीं, थककर भी चलते रहने का है।
शहर उसकी मंज़िल का नहीं
शहर उसके सफ़र का है।
— Anant Yadav
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