ANANT YADAV
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Anant Yadav

Author

To write is not merely to capture what exists, but to listen attentively to what silence has left unsaid.

Anant Yadav
Est. Solitude
About the Author

Investigating the intersections of memory, language, and quietude.

'''Anant Yadav''' writes for the feelings that words often fail to hold. An Indian author and poet, his work explores love, longing, silence, memories, and the quiet complexities of human emotion. His works include ''Apni Jhalak Ye Zindagi'', ''Chup Mat Raha Karo'', ''Jaa Rahi Ho'', and poetry collections ''Meri Priyashi'', ''Bolo Bhi'', and ''Bataya Karo''.

Literature must be an anchor of stillness in an age of noise. I believe poetry is the shortest distance between two souls, and honest prose is a mirror held not to the world's vanity, but to its tender vulnerabilities.

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जा रही हो
Literary Fiction 5.0

जा रही हो

जा रही हो — रुक जाओ, अभी कुछ कहना बाकी है

जा रही हो एक ऐसी कहानी है जहाँ विदाई सिर्फ़ किसी के जाने का नाम नहीं, बल्कि पीछे छूटती यादों, अधूरी बातों और उस ख़ामोशी का एहसास है जो किसी के चले जाने के बाद रह जाती है। यह किताब मोहब्बत, बिछड़ने और उस आख़िरी पल को महसूस करती है, जब दिल बस यही कहना चाहता है—“थोड़ा और ठहर जाओ।”

चुप मत रहा करो
Poetry 4.8

चुप मत रहा करो

जो दिल में है, कह दिया करो

चुप मत रहा करो* उन अनकही बातों और ख़ामोश एहसासों की किताब है, जो अक्सर दिल में रह जाते हैं। प्रेम, रिश्तों, दूरी और इंतज़ार के बीच यह किताब एक छोटी-सी याद दिलाती है—जो कहना है, कभी-कभी उसे कह देना चाहिए।

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वो प्यार थी

चुप मत रहा करो

वो मेरा प्यार थी… और न जाने कब वो मेरी ज़िंदगी का सबसे खूबसूरत हिस्सा बन गई। उससे बात करना सुकून था, उसका साथ मेरी आदत थी, और उसका होना मेरी दुनिया हुआ करता था। हमने साथ में कितने ख़्वाब देखे थे, कितनी बातें अधूरी छोड़कर कल में पूरी करने का सोचा था। लेकिन शायद हम हमेशा साथ रहने के लिए थे ही नहीं, एक दिन हमारा प्यार खत्म हो गया… न जाने किसकी गलती थी, न जाने कहाँ से दूरियाँ शुरू हुईं बस इतना पता है कि जिस इंसान के बिना एक पल मुश्किल लगता था, आज उसी के बिना जीना सीखना पड़ रहा है। वो मेरी प्यार थी… और अब सिर्फ़ मेरी एक याद है। प्यार ख़त्म नहीं हुआ, बस वो प्यार थी और नहीं रही।
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वो मेरी दोस्त थी

Chup mat raha karo

वो मेरी दोस्त थी बस एक दोस्त… लेकिन न जाने कब उसकी बातों में सुकून ढूँढते-ढूँढते मुझे उससे मोहब्बत हो गई। ऐसी मोहब्बत, जिसका कोई इरादा नहीं था, ऐसा कोई वादा नहीं था बस धीरे-धीरे वो मेरी आदत से मेरी ज़रूरत बन गई। फिर एक दिन दिल ने हिम्मत जुटाई, और मैंने अपने भीतर छुपा वो सच उसके सामने रख दिया “मुझे तुमसे मोहब्बत है।” कुछ पल ख़ामोशी रही… फिर होना क्या था, कुछ नहीं। शायद उसकी ख़ामोशी ही उसका जवाब थी। मैं इंतज़ार करता रहा कि शायद वो कुछ कहेगी, शायद मेरी मोहब्बत को समझेगी, शायद कहेगी “मुझे भी…” मगर वो “शायद” कभी हक़ीक़त नहीं बन पाया। उसका जवाब नहीं आया, लेकिन उसके बाद उसका होना भी धीरे-धीरे कम हो गया। बातें बंद हो गई, मुलाक़ातें बंद हो गई, और फिर एक दिन हमारे बीच सिर्फ़ पुरानी यादें रह गईं। मैंने उसे खोया नहीं था… मैंने तो बस अपने दिल की बात कही थी। मगर शायद कुछ सच रिश्तों को बचाते नहीं, उन्हें बदल देते हैं। जिस दोस्ती को मैं उम्रभर संभालकर रखना चाहता था, वही दोस्ती मेरी मोहब्बत के सामने दम तोड़ गई। और फिर… न वो मेरी दोस्त रही, न मेरी मोहब्बत। बस एक कहानी रह गई जिसमें मैंने दिल से चाहा, उसने ख़ामोशी से सुना, और हमारी पूरी दुनिया बिना किसी अलविदा के ख़त्म हो गई।
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क्यों रुकूं

चुप मत रहा करो

क्यों रुकूँ? उसकी मुस्कान पर रुकूँ, या उसकी आवाज़ में ठहर जाऊँ, उसकी आँखों में छुपे उस राज़ को देखूँ, या उसकी ख़ामोशी को पढ़ता जाऊँ? क्यों रुकूँ? उसकी बातों के लिए रुकूँ, या उसके हाथों की उस छुअन के लिए, उन मुलाक़ातों को फिर से जीने के लिए, या उन अधूरी चाहतों के लिए? क्यों रुकूँ? उन ख़ामोशियों के लिए जिनमें भी बहुत कुछ कहा था, या उन अधूरे वादों के लिए जिन्हें हमने कभी पूरा समझा था? क्यों रुकूँ? उन सुबहों के लिए जो कभी उसके नाम से शुरू होती थीं, या उन शामों के लिए जो उसकी यादों में ढलती थीं? क्यों रुकूँ? उन छोटी-सी बातों के लिए जिन पर घंटों मुस्कुराया था, या उन छोटी-सी लड़ाइयों के लिए जिनके बाद फिर उसे मनाया था? क्यों रुकूँ? उस एहसास के लिए जिसे शब्द कभी कह नहीं पाए, या उन पलों के लिए जो चाहकर भी लौटकर नहीं आए? क्यों रुकूँ? उसके मेरे पास होकर भी मुझसे दूर हो जाने के लिए, या उसे भूलने की कोशिश में हर रोज़ और याद करने के लिए? क्यों रुकूँ? लोग कहते हैं, वक़्त सब कुछ बदल देता है। शायद बदल भी देता होगा… मगर वो वक़्त के साथ नहीं बदला, वो ख़ुद वक़्त बन गया, तो… क्यों रुकूँ? किसी रास्ते पर नहीं, किसी मोड़ पर नहीं, किसी बीते हुए कल में नहीं मैं रुकूँगा तो बस उसकी याद में ।
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Usse mohabbat kisi umeed ke sahare nahi ki thi, phir woh kaise soch sakta hai ki uske baat na karne se, main use bhool jaunga…
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